छठ में घर जाने की मजबूरी है साब, ट्रेन के पौदान—टायलेट में बैठकर दिल्ली—मुम्बई से बिहार आ रहे लोग

PRIYADARSHAN SHARMA, MOKAMA : गांवों के फिर से बस जाने के त्योहार छठ पर हमारी परेशानी क्यों नहीं दिखती…..तस्वीर पिछले साल की है लेकिन इस बरस भी छठ पर बिहार आने वाली ट्रेनों का यही हाल है। करीब 44 घँटे का सफर कर भांजी आई है, बता रही है बेंगलुरु से भागलपुर तक लोग पौदान पर सफर करने को मजबूर थे। दस बारह लोग शौचालय में किसी तरह ठूंसे पड़े हैं। नीचे से लेकर ऊपर की सीट भरी पड़ी है।

 

 

 

 

 

चलने के रास्ते पर लोग बैठे हैं। आदमी की गोद में आदमी बैठा है। आदमी की गोद में औरत बैठी है और औरत की गोद में बच्चा। बच्चे किसी तरह ट्रेन की बोगी में घुस गए हैं और वे वहीं कहीं घुसिया कर खड़े हैं। कोई शौचालय तक के लिए नहीं उठ सकता। चौदह पंद्रह घंटे हो जाते हैं शौचालय गए। कुछ बच्चे तो वहीं बैठे बैठे बोतल में पेशाब करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। बच्चों की हालत का अंदाज़ा कीजिए और बस एक मिनट के लिए समझ लिए कि आपके बच्चे के साथ ऐसा हुआ हो तब आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी। किसी तरह घुट घुट कर लोग सफर करने के लिए मजबूर किये जा रहे हैं।

 

 

खैर इन सब के बाद भी छठ ही अब एकमात्र त्योहार बचा है जब बिहार के गांव गुलजार हो जाते हैं। छठ गांवों के फिर से बस जाने का त्योहार है। आप जाकर देखिये गांवों में कहां कहां से लोग आए होते हैं। हिन्दुस्तान का हर हिस्सा बिहार में थोड़े दिनों के लिए पहुंच जाता है। हम बिहारी लोग छठ से लौट कर कुछ दिनों बाद फिर से ख़ाली हो जाते हैं। छठ आता है तो घर जाने के नाम पर ही भरने लगते हैं।

 

हावड़ा हो या दिल्ली, पुणे हो या पुडुचेरी किसी भी स्टेशन से बिहार जाने वाली हर ट्रेन में ठसमठस भीड़ की स्थिति कुछ इसी फोटो की भांति है। जनरल डिब्बे में चढ़ने वाले लोगों को प्लेटफार्म पर कतारबद्ध करके खड़ा किया गया है ताकि भगदड़ न मचे। दोपहर 1 बजे खुलने वाली ट्रेन में बैठने के लिए लोग सुबह 9 – 10 बजे से ही कतारबद्ध हैं। यह हालत सिर्फ एक स्टेशन पर नहीं पूरे भारत में किसी भी शहर में चले जाएं पिछले एक सप्ताह 10 दिनों से बिहार जाने वाली हर ट्रेन का यही हाल है।

 

भले छठ पूरब के उजाड़ को अपनी मिट्टी से जोड़कर रखने वाला पर्व हो लेकिन हमारे उजाड़ की वीभत्स तस्वीर हमारे हुक्मरानों को नजर नहीं आती, उस पर जाति और धर्म में बंटा हमारा समाज ऐसे निक्कमे नेताओं को खाद पानी देता है।

 

कुछ बरस पहले ऐसी ही स्थिति पर रवीश लिखे थे, ये कौन सा भारत है जहां पखाने में लोग बैठकर अपना सबसे पवित्र त्योहार मनाने घर जा रहे हैं। क्या हम इतने क्रूर होते जा रहे हैं कि सरकार, राजनीति और समाज को इन सब तस्वीरों से कोई फर्क नहीं पड़ता। हर राज और हर साल की यह तस्वीर है। राजनीति और सरकार की समझ पर उस खाते पीते मध्यम वर्ग ने अवैध कब्ज़ा कर लिया है जो ट्वीटर और फेसबुक पर खुद ही अपनी तस्वीर खींच कर डालता हुआ अघाए रहता है। जो अपनी सुविधा का इंतज़ाम ख़ुद कर लेता है। लेकिन रेल आने से घंटों पहले कतार में खड़े उन ग़रीबों की कोई सेल्फी कहीं अपलोड नहीं हो रही है जिनकी आवाज़ अब सिस्टम और मीडिया से दूर कर दी गई है। ये बिहारी नहीं हैं। ये ग़रीब लोग हैं जो छठ मनाने के लिए दिल्ली या देश के अन्य हिस्सों से बिहार जाना चाहते हैं। हर साल जाते हैं और हर साल स्पेशल ट्रेन चलाने के नाम पर इनके साथ जो बर्ताव होता है उसे मीडिया भले न दर्ज करे लेकिन दिलों दिमाग़ में सिस्टम और समाज के प्रति तो छवि बन रही है वो एक दिन ख़तरनाक रूप ले लेगी। साल दर साल इन तस्वीरों के प्रति हमारी उदासीनता बता रही है कि देखने पढ़ने वाला समाज कितना ख़तरनाक हो गया है। वो अब सिर्फ अपने लिए हल्ला करता है, ग़रीबों की दुर्गति देखकर किनारा कर लेता है।

 

संवेदनहीन हो चुके सिस्टम और सरकार से सवाल पूछिये कि हमारी यह दुर्गति के लिए आप क्यों नहीं जिम्मेदार हैं? बुलेट ट्रेन से ज्यादा जरूरी बुनियादी सुविधाओं का हर आदमी को लाभ मिलना होना चाहिए। गांव छठ की तरह तभी खिलेंगे जब मानवीय संवेदनाओं को जीवंत रखने की कोशिश की जाएगी। सोचिये जिस खुशी के लिए हम बिहारी इतनी तकलीफदेह यात्राएं करते हैं वह छठ हमारे लिए सिर्फ पर्व नहीं परिवार से, गांव से जुड़े रहने का आख़िरी गर्भनाल है।

 

छठ ही वो मौका है जब लाखों लोग अपने गांव घर को कोसी की तरह दीये और ठेकुए से भर देते हैं। गांव गांव खिल उठता है। इसकी खूबसूरती ने तब ज्यादा निखार आएगा जब हमारे ही लोग इस नारकीय सफर से मुक्त होकर यात्रा करेंगे।

 

 

Input: Daily Bihar

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