अमित शाह की सीमांचल में एंट्री से पहले चर्चा में गिरिराज सिंह का बयान, लगेगा बिहार से हो रही लगातार घुसपैठ पर विराम?

भागलपुर: जदयू से राजनीतिक रिश्ते खत्म होते ही भाजपा ने अपने शीर्ष नेताओं के दम पर वोटरों की गोलबंदी शुरू कर दी है। सीमांचल में भाजपा की खास निगाहें हैं। कुछ दिन पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय इस इलाके में जनसंपर्क अभियान चला चुके हैं। अब बारी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की है। अमित शाह 23 और 24 सितंबर को दो दिवसीय दौरे पर सीमांचल के किशनगंज और पूर्णिया पहुंच रहे हैं। उनके राजनीतिक कार्यक्रमों के दौरान ही बीएसएफ और एसएसबी के अधिकारियों के साथ उच्चस्तरीय बैठक भी होनी है। इस बैठक में देश की सुरक्षा को लेकर बांग्लादेशी, रोहिंग्या घुसपैठ के साथ-साथ पशु और मादक पदार्थों की तस्करी पर उठाए गए कदमों की समीक्षा की जाएगी।

राजनीति के लिए उर्वर भूमि है सीमांचल

राजनीति के लिए सीमांचल के चार जिले उर्वर हैं। बीते विधानसभा चुनाव में यहां की पांच विधानसभा क्षेत्रों में असुद्दीन ओवैसी की पार्टी आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन (एआइएमआइएम) ने जीत हासिल की थी। हालांकि, उसके चार विधायक राजद में शामिल हो गए। प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल इमाम पार्टी के इकलौते विधायक के रूप मे बचे हैं। भाजपा इस इलाके में तख्ता पलट करना चाहती है। इलाके में भाजपा की मजबूत पकड़ भी है। वे अपने पुराने वोटरों को एकजुट कर, नए वोटर जुटाने की कवायद कर रही है। जदयू का राजद में विलय होने के बाद गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय को यह जिम्मेदारी देते हुए भेजा गया था कि वे पार्टी से जुड़े सभी लोगों को गोलबंद करें। इस काम में उन्हें सफलता भी मिली। अब गोलबंद हुए पार्टी कार्यकर्ता पार्टी के दिग्गज नेता अमित शाह के स्वागत की तैयारी में लग गए हैं।

बदली है सीमांचल की डेमोग्राफी

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. राम नरेश सिंह का कहना है कि आजादी के बाद से ही सीमांचल में एक खास वर्ग के द्वारा प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश जारी है। इससे सीमांचल की डेमोग्राफी (जनसंख्यिकी) में बड़ा बदलाव हुआ है। सीमांचल के तीन जिले अररिया, किशनगंज और कटिहार पूर्णिया का ही हिस्सा रहे हैं। तब पूर्णिया में 64 फीसद हिंदू और 36 फीसद मुस्लिम आबादी हुआ करती थी। अभी स्थिति इसके विपरीत है। उदाहरण के तौर पर किशनगंज में 70 फीसद मुस्लिम और 30 फीसद हिंदू हैं। ये जो बदलाव आया है, यह गंभीर चिंता का विषय है। यह आंकड़ा ये बताने के लिए काफी है कि इस इलाके में हितैषियों के जरिए किस तरह घुसपैठ हुआ है। घुसपैठ की वजह से आर्थिक असमानता भी बढ़ी है। विभिन्न योजनाओं के 10 हजार करोड़ रुपये सिर्फ इन घुसपैठियों पर खर्च हो रहे हैं। इलाके में सांस्कृतिक बदलाव भी आया है। घुसपैठ को बढ़ाने में पंचायत और शहरी निकायों के पार्षदों की भूमिका संदिग्ध रही है।

राष्ट्रीय परिषद की बैठक में भी हो चुकी है चर्चा

भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में इस मसले पर चर्चा भी हो चुकी है। फारबिसगंज के विधायक विद्यासागर उर्फ मुनचुन केसरी सहित सीमांचल के अन्य विधायकों और विधान पार्षदों ने बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठ की चर्चा अमित शाह और जेपी नड्डा के समक्ष की थी। जनप्रतिनिधियों ने ये बताया था कि मवेशी, कीमती लकड़ियों और मादक पदार्थों की तस्करी सीमावर्ती इलाकों में धड़ल्ले से हो रही है। इससे होने वाली कमाई का एक बड़ा हिस्सा टेरर फंडिंग में दिया जा रहा है। जनप्रतिनिधियों की बात को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह वहीं गंभीर हो गए। सूत्रों की मानें तो पूर्णिया और किशनगंज में पार्टी कार्यक्रमों के साथ-साथ वे बीएसएफ और एसएसबी के अधिकारियों के साथ बांग्लादेश और नेपाल के बार्डर की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा भी कर सकते हैं। इधर, भाजपा के एक और कद्दावर नेता सह केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि सीमांचल में सघन जांच अभियान चलाने की जरूरत है। उन्होंने कहा है कि राज्य में रोहिंग्या और पीएफआइ के सदस्यों की पहचान करके उन्हें वापस भेजनी की जरूरत है। बढ़ रहे मदरसों की संख्या और उनकी जांच होनी चाहिए।

घुसपैठ के कुछ मामले

चार दिन पूर्व कटिहार स्टेशन पर पूर्वोत्तर संपर्क क्रांति एक्सप्रेस से छह रोहिंग्या युवतियों और दो पुरूषों की गिरफ्तारी की गई है। रेल पुलिस ने मामला दर्ज कर गिरफ्तार रोहिंग्या को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है। अब तक की पूछताछ में पकड़े गए रोहिंग्या के दिल्ली जाने के स्पष्ट कराणों की जानकारी नहीं मिल पाई है।

रोहिंग्या के अलावा उज्बेकिस्तान और चीन से भी घुसपैठ की जा रही है। पूर्व में कई मामले संज्ञान में आए। सीमावर्ती जिलों में लड़कियों की बरामदगी हो या चीनियों की गिरफ्तारी। यही नहीं दिल्ली में पकड़े गए आतंकी मोहम्मद अशरफ और अली अहमद नूरी के नाम के पासपोर्ट किशनगंज से बने थे, जिसमें स्थानीय मुखिया की भूमिका संदिग्ध रही। वर्ष 2017 में बंग्लादेश की सीमा पर 80 मीटर की सुरंग का खुलासा हुआ। जिसे घुसपैठ के लिए ही बनाया गया था।

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